बेटी कभी नहीं बन सकती थी मां, जिसके कारण 55 वर्ष की महिला ने दिया अपनी नातिन को जन्म..!

कहते हैं कि एक लड़की की सबसे अच्छी दोस्त उसकी मां होती है। मां और बेटी का रिश्ता ऐसा होता है कि वो एक-दूसरे के मन की बात को अच्छी प्रकार से समझती भी हैं और हमेशा एक-दूसरे का साथ देती हैं। कहते हैं ना की मां अपनी बेटी की खुशी के लिए कुछ भी कर सकती हैं। तो आज हम आपको एक ऐसी ही मां और बेटी के विषय में बताएंगे जिन्होंने इस बात को साबित कर दिखाया है। एक मां ने अपनी बेटी के लिए उसकी सेरोगेट मदर बनी। तो चलिए अब आपको बताते हैं पूरा माजरा क्या है।

loading...
वेल्स में रहने वाली 55 साल की एम्मा माइल्स ने अपनी ही नातिन को जन्म दिया है। वो अपनी ही बेटी के लिए सेरोगेट मदर बनीं। दरअसल एम्मी की लड़की स्मिथ का जन्म ही बिना कोख के हुआ था जिस कारण वो कभी जीवन में मां नहीं बन सकती थीं। जिसकी वजह से स्मिथ को एक सेरोगेट मदर की तलाश थी। तथा अपनी बेटी को मां का सुख देने के लिए स्मिथ की मां एम्मी ने उनकी बच्चे की सेरोगेट मदर बनकर बच्ची को जन्म दिया।

बता दें कि ट्रेसी स्मिथ बचपन से ही MRKH (Mayer-Rokitansky-Küster-Hauser Syndrome) बीमारी से पीड़ित हैं। जिसके कारण वो जीवन में कभी मां नहीं बन सकती थी लेकिन उनकी ओवरी पूरी तरह से ठीक थी। स्मिथ की मां ने अपनी नातिन को जन्म देने के लिए इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) का सहारा लिया तथा अपनी बेटी की ही बेटी को जन्म दिया।

क्या होता है इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF)


इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) एक ऐसी प्रक्रिया हैं जिसमें महिला के अंडाशय से अंडे निकालकर शरीर उसका संपर्क द्रव माध्यम में शुक्राणुओं से कराया जाता है। इसके पश्चात उस भ्रूण को बच्चे को जन्म देने वाली महिला के अंदर रखा जाता है। यह कृत्रिम गर्भ धारण करने की सबसे प्रभावी प्रक्रिया मानी जाती है। इसी प्रक्रिया के सहारे एम्मा ने अपनी नातिन को जन्म दिया है। बता दें क्योंकि एम्मा की उम्र अधिक थी इसलिए प्रेगनेंट होने के लिए उन्होंने अपना वजन 38 किलो कम किया। साथ ही उन्होंने प्रेगनेंट होने के लिए कई हार्मोनल मेडिकेशन का भी सहारा लिया था जो शरीर में आपके हार्मोंस को संतुलित रखता है।

पहली बार कब हुआ था इस प्रक्रिया का इस्तेमाल


बता दें कि विश्व में सबसे पहली बार IVF प्रक्रिया का प्रयोग यूनाइटेड किंगडम में पैट्रिक स्टेपो तथा रॉबर्ट एडवर्डस ने किया था। सबसे पहले इस प्रक्रिया का इस्तेमाल करके जिस बच्चे को जन्म दिया गया था उसका नाम लुईस ब्राउन था। लुईस का जन्म 25 जुलाई 1978 में हुआ था। भारत में इस तकनीक का उपयोग डॉक्टर सुभाष मुखोपाध्याय ने किया था।

आज ये प्रक्रिया उन लोगो के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं जो कभी पेरेंट्स नहीं बन सकते थें। उनके लिए यह प्रक्रिया एक वरदान की तरह सिद्ध हुई थी। हालांकि अब यह प्रक्रिया पूरे विश्व भर में जानी जाती हैं और लोग इसके जरिए माता-पिता बनने का सुख प्राप्त कर सकते हैं।