नाव में 15 व्यक्ति सवार थे जिसके डूबने के पश्चात रविंद्र अकेला ही बच पाया..!

समुद्र एक बहुत ही विशाल चीज हैं। जहां तक आपकी नजरें जाती हैं वहां तक पानी ही पानी नजर आता हैं। समुद्र में सफर करने के अपने अलग रिस्क होते हैं। जब बस या ट्रेन में कोई अनहोनी होती भी हैं तो आपको बचने के लिए आसपास लोग मौजूद रहते हैं, हालाँकि समुद्र में ऐसा नहीं होता हैं। अगर दुर्भाग्य से आपकी नाव या जहाज समुद्र में डूब जाए तो आपको फौरन मदद मिल पाना बेहद मुश्किल होता हैं। समुद्र में नाव का इस्तेमाल ज्यादातर मछुआरे लोग करते हैं। अपनी जीविका चलाने के लिए ये नाव में सवार होकर मछली पकड़ने निकल जाते हैं। जब तूफ़ान आता हैं तो समुद्र सबसे अधिक खतरनाक बन जाता हैं। फिर आपको इसका रोद्र रूप देखने को मिलता हैं। समुद्र की बड़ी बड़ी लहरों के आगे कई नावे डूब जाती हैं।
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ऐसा ही कुछ पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में नारायणपुर निवासी रवींद्र नाथ दास और उनके अन्य 14 साथियों के साथ हुआ। ये सभी लोग 4 जुलाई को नाव में सवार होकर मछली पकड़ने समुद्र यात्रा पर निकले हुए थे। फिर 6 जुलाई के दिन एक जबरदस्त तूफ़ान आ गया। ऐसे में इनकी नाव पलट गई। इसके बाद कुछ लोग समुद्र में कूदे तो कुछ नाव के निचे ही कुचल कर मर गए। जैसे जैसे समय बितता चला गया एक एक कर सभी की समुद्र में डूबने के कारण जाने जाती गई। रविंद्र बताते हैं कि नाव में उनका भतीजा भी था जिसकी जान उनके बचने के केवल कुछ ही घंटे पहले ही गई थी। इसलिए उन्हें अपने भतीजे को ना बचा सकने का मलाल हैं।
रविंद्र को 10 जुलाई के दिन चिटगांव के पास बांग्लादेश के जहाज के क्रू ने बचाया था। दरअसल जब नाव डूबी थी तो रविंद्र एक बांस के टुकड़े के सहारे तैरते रहे थे। वे समुद्र में इसी के सहारे पांच दिनों तक रहे। इस दौरान वे भूखे रहे और पानी भी केवल बारिश का ही पी पाए। इन पांच दिनों में उनके मन में कई बार ख्याल आया कि वे अब नहीं बच सकेंगे मगर फिर उन्हें जीने की तमन्ना होसला देती और वे किसी तरह संघर्ष कर आगे बढ़ते चले जाते। इस तरह तैरते तैरते वे बांग्लादेश की सीमा में दाखिल हो गए। यहाँ उनकी नजर बांगला देश के एक जहांज पर पड़ी। वो बहुत दूरी पर था लेकिन रविंद्र ने फुर्ती दिखाई और दो घंटे लगातार तैरने के बाद किसी तरह उसके नजदीक जा पहुंचे। फिर जहाज में मौजूद लोगो ने रविंद्र को बचा लिया।
फिलहाल रविंद्र कोलकाता के एक अस्पताल में अपना इलाज करवा रहे हैं। उनके जल्दी ठीक होने की उम्मीद हैं। 15 लोगो के ग्रुप में वे अकेले हैं जो इस आपदा से जिंदा बाहर निकल पाए। इसमें उनके भाग्य के साथ साथ उनकी कभी ना हार मानने की सोच का भी बड़ा हाथ रहा। सोशल मीडिया पर जब लोगो को रविंद्र की कहानी के बारे में पता चला तो हर कोई दंग रह गया। लोग उनके जज्बे और हिम्मत की सलामी देने लगे।