दो दिन की मीटिंग, तीन व्यक्ति, चाय पानी का बिल आया डेढ़ लाख रुपये..!

वैसे तो हमारे देश के पास काफी सारा ‘राष्ट्रीय’ मामला है। जैसे राष्ट्रीय गान, राष्ट्रीय पशु, राष्ट्रीय पक्षी, इत्यादि। लेकिन अगर ‘राष्ट्रीय पेय’ होता तो ? माने कि हिंदी में समझाऊं तो आप ‘नैशनल ड्रिंक’ समझ लो। तो यदि हमारे नेशन के पास कोई नैशनल ड्रिंक होती, तो क्या होती। किसी से पूछ लीजिए, लपक के एक ही जवाब छलकाएगा। चाय, भाई सब चाय।

ख़बर क्या है ?

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चाय लगभग सभी पीते हैं। और चाय खाता भी सबका होता है। चाय खाता माने कि चाय वाले के यहां अपने नाम का उधार खाता। इस देश में बैंक खाता किसी का खुला हो ना खुला हो। मगर चाय खाता स्कूल कॉलेज के दिनों से ही खुल जाता है। लोगों को चाय पिलाकर, चाय वाले की तरफ़ दाहिना हाथ उठाकर ये कहना कि ‘मेरे खाते में लिख देना’ एक अलग ही स्वैग का निर्माण करता है। मगर बिल होता कितना है? उतना ही जितना एक स्कूली बालक की जेब सह सकती है। लेकिन नागपुर में अजीब किस्सा सामने आया है। नागपुर यूनिवर्सिटी में एक मीटिंग थी। यूनिवर्सिटी की बोर्ड ऑफ स्टडीज बैठक में तीन लोग शामिल हुए और इनके चाय, कॉफी और नाश्ते में डेढ़ लाख रुपये का बिल बनाया गया। बिल के मुताबिक मीटिंग में शामिल इन तीन लोगों ने 99 कप चाय और 25 कप कॉफी पी।

जब यूनिवर्सिटी के पास बिल पहुंचा

इस चाय-नाश्ते का बिल जब यूनिवर्सिटी के वीसी एसपी काने के पास पहुंचा तो उनके कान खड़े हो गए (वैसे बैठे ही कब थे)। उन्होंने बिल को न सिर्फ मंजूरी देने से मना कर दिया बल्कि वित्त विभाग से इसकी जांच भी शुरू करवा दी। असल में जब ये बिल वित्त और अकाउंट सेक्शन के हेड राज हिवासे के पास आया तो वह आश्चर्य रह गए और उन्होंने इसकी शिकायत वीसी से कर दी।

राजू हिवासे ने लोकल प्रेस से कहा कि हम लोगों ने बिल पास करने से इनकार कर दिया और उसे संबंधित विभाग को वापस कर दिया। हमने अध्ययन बोर्ड से स्पष्टीकरण मांगा है कि चाय-कॉफी का बिल इतना अधिक कैसे हुआ। अगर ये बिल सही हैं तो उनसे इसे साबित करने को कहा गया है।

डोंगी पर बालू ढोना सुना है ?

एक चीज़ होती है डोंगी। गरीबों की नाव। अधिक लकड़ी नहीं लगती। जुगाड़ टेक्निक से बनती है। एक दो जन को डूबने से बचा भर लेती है। और कभी-कभी रात के अंधेरे में कोई डोंगी मालिक नदी से बालू चुराकर ढो लाता है। कभी-कभी तक तो ठीक है। मगर कहावत पुरानी है कि लालच बुरी बला है भईया। पर कोई माने तब तो। जब मन ज़्यादा ललचाता है तो डोंगी वाला ज़्यादा से ज़्यादा बालू डोंगी पर लाद देता है। फिर आधी नदी पार करते-करते डोंगी जाती है डूब। तो बात कुल यही है। डोंगी पर जित्ता समाएगा, बालू उत्ता ही तो आएगा।
तो अब आप दिमाग़ भिड़ाइए और सोचिए कि दो दिन में तीन लोग मामूली सी कैंटीन में बैठकर डेढ़ लाख की चाय कॉफ़ी कैसे पी गए ? और इसी सवाल में ऐसे अनगिनत जवाब मिलेंगे जो इंसानी फ़ितरत, हिसाब का दलदल तथा व्यवस्था की डूबती डोंगी के बारे में आपको बहुत कुछ समझा देंगे।