मिस्र की शापित 'ममी' की जुड़वा चाहिए? मात्र चंद करोड़ रुपये और एक ओझा के साथ जल्द लंदन पहुंचिए..!

विश्व की सबसे खास  ‘ममी’ के स्कल्प्चर की बोली लगने वाली है। ये इजिप्ट के तुतनखामन की ‘ममी’ का स्कल्प्चर है। स्कल्प्चर बोले तो पत्थर की मूर्ति। शापित कहे जाने वाले मकबरे से इस मूर्ति को निकाला गया था।

 # मगर इजिप्ट ये नहीं चाहता

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3000 साल पुराने तुतनखामन के सिर के स्कल्प्चर की लंदन में बोली लगने वाली है। पत्थर से बनी इस मूर्ति को ‘आमेन का सिर’ भी कहते है।  इजिप्ट में बाक़ायदा एंटिक्यूटिज़ मिनिस्टरी (जो एंटिक चीजों की निगरानी करते हैं) बोली का विरोध कर रही है। उनका कहना है कि द रिसैंन्ड्रो कलेक्शन (क्रिस्टी के नाम से मशहूर) इस मूर्ति की बोली लगाएगा। इनके पास इजिप्शियन एंटिक्स का प्राइवेट कलेक्शन है। जवाब में कहते हैं

# खोज कैसे हुई ये भी जान लीजिए 

22 नवंबर 1922 को एक ब्रिटिश आर्किओलॉजिस्ट हावर्ड कार्टर एक बंद दरवाजे के सामने खड़ा था। पीछे लॉर्ड कारनार्वों थे। दोनो घबराए हुए थे। आगे क्या होगा ये सोचकर नहीं। बल्कि दरवाजे पर सेंध के निशान देखकर। किसी ने चोरी के इरादे से दरवाजे को तोड़ने की कोशिश की थी। डर गए कि कहीं अंदर रखा सारा सामान न चोरी हो गया हो। ‘ऑल इज़ वैल’ बोलकर हाथ में मोमबत्ती लिए कार्टर अंदर घुस गए। अंदर बहुत अंधेरा था। धूल की वजह से सब धुंधला दिख रहा था। तभी कमरे में रखी सोने की चीजें देखकर भौंचक्के रह गए। दूसरी ओर दिखाई दिया एक और रहस्यमयी दरवाजा। कमरे की दीवारों पर अजीब चित्र बने हुए थे। बहुत देर तक जब कार्टर कुछ न बोले तो कारनार्वों घबरा गए। आवाज लगाई, कार्टर! तुम्हें कुछ दिखा क्या? तो कार्टर उत्साहित होकर बोले, ‘हां! कमाल की चीजें।’

 # क्या वाक़ई शापित था मकबरा ?

मुर्दा शरीर से ममी बनाई जाती थी। आंतों को संभाल कर डिब्बों में तथा शरीर को पट्टियों से बांधकर ताबूत में बंद करते थे। जब इतने सालों बाद मकबरे को खोला जाता था। तब तक उसमें फंगस और बैक्टीरिया डेरा जमा लेते थे। इसलिए अंदर जाने वाले लोगों को बीमारियों का खतरा रहता था।

 # क्या लोग मकबरे में घुसने से मर रहे थे?

शाप की हकीकत जानने के लिए, मकबरे के अंदर गए लोगों कि मौत पर रिसर्च की गयी। 1934 में हर्बर्ट विनलॉक की इस रिसर्च में पाया गया कि, तुतनखामन के मकबरे को खोलने के पीछे 26 लोग थे। उनमें से दस वर्ष के अंदर छह लोग मरे थे। जिनमें से एक कारनार्वों 57 की उम्र में मरे। जबकि हावार्ड उनसे 16 साल बाद मरे थे।

डग्लस जिन्होंने तुतनखामन की ऑटोप्सी की थी। वो 87 साल की उम्र में मरे। ऑटोप्सी में मरे हुए व्यक्ति की बॉडी से मौत का कारण पता लगाया जाता है। फिर 2002 की नेल्सन की रिपोर्ट आई। जिसमें बताया था कि 25 लोग जिनकी मौत शाप से होनी चाहिए थी। वो औसतन 70 की उम्र तक जिए। उस वक्त लोगों की औसत उम्र 47 से लेकर 76 हुआ करती थी। हावर्ड की मौत ‘लिंफोमा’ फेफड़ों की बीमारी से हुई थी  इस पूरी कहानी से ऐसा लगता है कि अफ़वाहों वाली बात सच नहीं है, बल्कि इन मौतों के पीछे एक भरा पूरा विज्ञान काम कर रहा था।