यह विश्व का सबसे 'महंगा' बैग है, इसे खरीद पाना हर किसी के बस की बात नहीं..!

ढेर सारे लल्ली और लल्लन हैं, जो किसी गुमनाम गांव से निकल कर इतनी आगे जाते हैं कि दुनिया प्रशंशा में बम-बम हो जाती है। ये आगे बढ़ पाते हैं क्योंकि उनके गांव के सरकारी स्कूल में टीचर पूरी लगन के साथ पढ़ाई करवाते हैं। बच्चे उन्हें मास्साब या बहिन जी कहते हैं। ऐसी ही एक टीचर हैं। बहराइच के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाती हैं। तथा पढ़ाते-पढ़ाते बच्चों को पढ़ती भी रहती हैं,। इन्होंने हाल ही में अपनी फेसबुक वॉल पर एक पोस्ट लिखी। पढ़कर हमें लगा कि ये पोस्ट आपके पढ़ने लायक है। मई-जून की भीषण गर्मी में जब पांच डिजिट आय वाले खाये-अघाये गवर्नमेंट स्कूल के अध्यापक सपरिवार हिल स्टेशन पर जाकर वहां की फोटो फेसबुक पर अपलोड कर रहे होते हैं, ठीक तभी इनके बच्चे (स्कूल वाले) 48 डिग्री तापमान के अंदर चिलचिलाती धूप में खेतों में केवल इसलिए काम कर रहे होते हैं ताकि जुलाई में स्कूल खुलने पर वे कॉपी-कलम खरीद सकें।
श्रावस्ती-लखनऊ हाई वे की टू-लेन चमचमाती रोड। जिस पर अमूमन किसी की रफ़्तार 100 से नीचे नहीं होती। इसी सड़क से जरा सा नीचे उतरते ही जीवन की स्मूदनेस के सारे मुखौटे खिसकने लगते हैं। गांव अजीजपुर। जो इस हाई वे से बमुश्किल 300 मीटर की दूरी पर है और राजधानी से ज्यादा से ज्यादा 90 किलोमीटर। मुस्लिम बाहुल्य आबादी वाले इस गांव में पिता ताहिर अली की तीसरी संतान है शाहिद। शाहिद, जो बस बारह वर्ष का है। अपने हमउम्र बच्चों सा ही मासूम और चंचल। इतना चंचल कि एक दिन स्कूल न आए तो कुछ मिसिंग सा लगता है।

इस बार जुलाई के पहले हफ़्ते में जब शाहिद स्कूल में दिखाई नहीं दिया, तो मैंने पूछा-

शाहिद कहां है? स्कूल क्यों नहीं आ रहा?

उसका बैग फट गया है मैम। कहता है, बिना बैग के स्कूल नहीं जाऊंगा – उसकी बहन ने बताया ये।

अजीब लड़का है… यह कहते हुए मैंने सोचा कि कल शाहिद के घर जाकर समझाती हूं। मगर इसकी नौबत नहीं आई। अगले दिन शाहिद स्कूल में था।

‘स्कूल क्यों नहीं आ रहे थे? बैग फट गया, तो मुझे बताया क्यों नहीं,’ मैंने झूठ का गुस्सा दिखाते हुए कहा।

मैं बैग ले आया मैम… उसने बड़ी शान से बताया और बैग लाकर मुझे दिखाया।

कितने का है? उसकी खुशी में शामिल होते हुए बैग उलट-पलटकर देखते हुए मैंने पूछा।

320 रुपया बताया उसने तथा 270 का दिया – शाहिद बोला।

पैसे कहां से आए?मैंने एकटक उसकी तरफ देखते हुए कहा। मैं जानती हूं कि कम-से-कम बैग खरीदने जैसी लग्ज़री इसे घर की तरफ से हासिल नहीं है।

धान बैठाने (रोपने) की मजदूरी करके लाया मैं…

ये जवाब सुनकर मैं शाहिद को गले लगा लेना चाहती हूं। बस बारह वर्ष का बच्चा। अपने स्कूल बैग के लिए मजदूरी करने जा रहा है। इस बचपन पर रो दूं या इस स्वभिमान पर न्योछावर हो जाऊं। मैं निशब्द हूं। मैं चुप हूं। मगर उसे इस बात का फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि उसके लिए यही जीवन है।