बिजली विभाग ने इतना बिल भेज दिया कि ज़ीरो गिनते-गिनते व्यक्ति बीमार हो गया..!

कभी-कभी लगता है कि हमारा देश आशंकाओं का देश है। जिसे संभावनाओं का महादेश होना चाहिए था, वो देश आशंकाओं का देश बन गया है। कभी भी कुछ भी हो सकने की आशंकाएं। ग़लतियां हो जाती हैं। इन ग़लतियों के लिए हमारे सिस्टम में बाक़ायदा जगह रखी गई है। प्रदेश के मुखिया तक कह देते हैं ‘ग़लतियां हो जाती हैं’। मगर एक होती है ग़लती, और दूसरा होता है अपराध।
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उत्तर प्रदेश का एक शहर हापुड़। मोहल्ला चमरी। एक घर में जब बिजली का बिल आया तो परिवार के दिमाग़ की बत्ती ही गुल हो गई। क्योंकि बिल था एक सौ अट्ठाईस करोड़ का। ये रक़म उतनी ही है जिसे यदि बोर्ड पर लिखने को कहा जाए तो काम भर ज़ीरो ना लगाने की वजह से किसी की भी डिग्री ज़ीरो मानी जाएगी। इस रक़म में कई पावर हाउस बन सकते हैं। ये उतनी ही रक़म है जितने में ‘वंदे भारत’ जैसी आधुनिक ट्रेन चलाई जा सकती है। जिससे हर रोज़ सैकड़ों मील का सफ़र हो सकता है। मगर शमीम का घर क्या इतनी दूर था कि विभाग के कर्मचारी वहां जाकर मामला नहीं समझ सके?
आज तक से जुड़े हापुड़ के संवाददाता देवेन्द्र ने जो बताया वो संसार का आठवां अजूबा कहला सकने वाली बात है। बिल वसूली की बात। शमीम को बिल मिल चुका था। बिजली विभाग ने काम निपटा लिया था। जब बिल भेजा है तो वसूली भी होगी। शमीम अब दौड़ने लगे बिजली विभाग। चप्पल घिस गई और बिस्तर से जा लगे। सोच-सोच कर बीमार हो लिए। बिजली विभाग कहता रहा ‘बिल भरो, बिल तो भरना ही होगा।’
बिल भेजने के चार दिन पश्चात शमीम के घर की बिजली काट दी गई। ज़ाहिर सी बात है कि बिजली विभाग ये सारी क़वायद बिल वसूली के लिए ही कर रहा था। शमीम लाख कहता रहा कि विभाग ने ग़लत बिल भेजा है। मगर विभाग के कर्मचारी नहीं माने तो नहीं ही माने। इस सारी दौड़ धूप में शमीम बीमार पड़ गए।
शमीम के मामले में एक चीज़ अच्छी हुई कि ये ग़लती नहीं जुर्म था। जो किसी के गले से निगला नहीं जा सका। वरना अगर ये ग़लती से लाखों का मामला होता तो शायद बिजली विभाग ज़मीनें बिकवा कर वसूली कर भी सकता था। अनगिनत मामले देश भर से आते हैं जिनमें बेतुके बिल भेजकर बिजली विभाग पीड़ित से आड़े तिरछे तरीक़ों से वसूली करता है। बरसों मुक़दमे लड़े जाते हैं। मगर ये सब होता है जब ग़लती हो जाती है। शमीम के मामले में अपराध हुआ। और अपराध सुधारे नहीं जा सकते। इसके लिए सज़ा मिलती है।