जहां बेटी पैदा होते ही मार डालते थे लोग वहां अब जन्म के साथ मनाया जाता है उत्सव..!

एक युवक दिव्यांशु उपाध्याय, जिसने ग्रेजुएशन करते समय ही सपना देखा गांवों के विकास का। अपने मन की बात को दोस्तों संग शेयर किया। फिर देखते ही देखते बन गई युवाओं की टीम, जिसे नाम दिया गया "होप"। इस होप संस्था के साथ दिव्यांशु ने सबसे पहले बनारस के खुशियारी गांव का चयन किया। एक ऐसा गांव जहां आजादी के 70 वर्ष बाद भी न बिजली थी, न प्राइमरी स्कूल न प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र। गांव के पुरुषों में जुआ और नशे की बुरी लत थी। ऐसे में इस टीम ने पहले जोड़ा गांव की महिलाओं को और उन्हें ही लीडर बना कर गांव को नशा मुक्त किया। फिर प्रशासन पर दबाव बना कर वो सारी सुविधाएं गांव को दिलाईं जो उनका अधिकार था। धीरे-धीरे एक से 10 गांवों में खुशियां आईं। उसके बाद इन युवाओं को बुलावा आया मिर्जापुर के नक्सल प्रभावित क्षेत्र परिवारों में जीवन ज्योति जगाने की। डगर आसान नहीं थी लेकिन इन्होने इस चैलेंज को भी स्वीकारा और उन नक्सल प्रभावित 23 गांवों के परिवारों की जिंदगी बदल दी। सबसे खास यह कि इन गांवों मे जहां बेटी पैदा होने पर मार डाला जाता था वहां अब जन्म के वक्त जश्न मनाया जाता है। पत्रिका ने टीम होप के लीडर दिव्यांशु से अपने कार्यालय में बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश...
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दिव्यांशु ने बताया कि बात 2015 की है जब मैं ग्रेजुएश कर रहा था, तभी रवि मिश्रा व अन्य दोस्तों के साथ गंगा घाट पर बैठ कर आपस में चर्चा की कि समाज के लिए कुछ करना चाहिए। हम लोगों ने पहले कुंडों की सफाई की। असि नदी को साफ करने का बीडा उठाया मगर वो मजा नहीं आ रहा था। फिर एक दिन सोचा गया कि कुछ ऐसा किया जाए जिसका बड़ा इम्पैक्ट दिखे। यूं ही बातचीत में एक चीज निकल कर आई कि क्यों न गांवों का सर्वे किया जाए और देखा जाए कि गांवों के हाल क्या हैं। सर्वे रिपोर्ट बड़ी भयानक थी। गांवों में लोगों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं थीं। न प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र न प्राइमरी स्कूल। न सड़कें थीं न बिजली। फिर इसे ही फाइनल किया गया कि एक-एक गांव को पकड़ा जाए और वहां विकास की ज्योति जलाई जाए।
दिव्यांशु ने बताया कि शुरूआत में लोगों को जोड़ने में बहुत दिक्कत हुई। लोगों में विश्वास जताना बड़ा चैलेंज था। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें मोटीवेट करना प्रारंभ किया गया। सबसे पहले चुना गया था खुशियारी गांव, वहां की महिलिाओं से बातचीत शुरू की गई तो पुरुषों में नशा और जुआ की लत का पता चला। अब यहीं से हम सभी ने शुरूआत की और महिलाओं की टीम बनाई गई। इसमें पुलिस और जिला प्रशासन की मदद ली गई। संयोग से उस समय अधिकारी भी अच्छे मिले और उन्होंने पूरा सहयोग किया। इन महिलाओं का ग्रीन ग्रुप बनाया गया। इन्हें सुरक्षा की ट्रेनिंग दिलाई गई। उनके संवैधानिक अधिकारों को बताया गया। इन महिला को पुलिस की पूरी मदद दिलाई गई। नतीजा साल भर में गांव नशा व जुआ मुक्त हो गया। इसी बीच सड़क बनी, बिजली आई, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी और प्राथमिक स्कूल भी खुला। इस बीच हमारे टीम के सदस्य इन्हें शिक्षित करने का भी काम किया। गांवों में पेड़ के नीचे क्लास चलते थे।

बनारस के इन गांवों का किया विकास
उन्होंने बताया कि खुशीयारी गांव के पश्चात एक-एक कर हमने देउरा, रमसीपुर, भद्रासी, जगरदेवपुर, तारापुर, सराय डंगरी, मूढादेव, कुरहुआ गांवों का विकास किया। इतना ही नहीं अब ये ग्रीन ग्रुप की महिलाएं आत्म सुरक्षा से लैश हो चुकी थीं। उन्हें अपने अधिकार और कर्तव्य की जानकारी हो चुकी थी। ऐसे में इन महिलाओं की सहायता मांगी जाने लगी प्रशासन से। सबसे पहले इन महिलाओ की टीम ने 2017 के विधानसभा चुनावों में गवंई भाषा में गीत गा कर लोगों को मतदान के लिए मोटीवेट किया, नतीजा पांच से आठ फीसदी तक मतदान प्रतिशत बढा।

बनारस में सफलता के बाद बुलाया गया मिर्जापुर
दिव्यांशु ने बताया कि अब बनारस के पश्चात हमें मिर्जापुर के नक्सल प्रभावित गांवों का जीवन सुधारने के लिए बुलाया गया। वो समय था अक्टूबर-नवबर 2017 का। मिर्जापुर के एसपी आशीष तिवारी ने टीम होप को आमंत्रित किया था। यह काम बहुत चुनौतीपूर्ण था। सबसे पहले हम लोग गए राजगढ, वहां कोई बात तक करने को तैयार नहीं था। एक बार तो हम लोग तिवारी सर को यह कह कर लौट आए कि हमसे नहीं होगा। मगर उन्होंने हिम्मत बढ़ाई। दिक्कत ये थी कि पुलिस को साथ लेकर नक्सल प्रभावित परिवारों के पास जा नहीं सकते थे। उनके मन में यह विश्वास जगाना कठिन हो रहा था कि हम सरकारी लोग नहीं हैं। हम युवा केवल आपकी समस्या को जानने और उसे दूर करने, बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने आए हैं। तीन-चार महीने की मशक्कत के बाद राजगढ की कुछ महिलाओं को हमलोंगों ने राजी कर लिया।

मिर्जापुर के इन बीहड़ों की बदली तस्वीर
राजगढ की महिलाएं तैयार हुईं तो वहां भी ग्रीन ग्रुप तैयार किया गया। उन्हें भी वो सारी जानकारी और सुविधाएं मुहैया कराई गईं जो बनारस की महिलाओं को दिलाई गई थीं। अब धीरे-धीरे हम लोगों ने पांव पसारना प्रारंभ किया। यहां भी नशा और जुआ मुक्ति अभियान चलाया गया। उसमें शुरूआत में दुश्वारियां तो आईं पर कामयाबी भी मिली। फिर हम लोगों ने भवानीपुर, भीटी, रामपुर 38, दनसेरिया, पुरेनिया, खुदी, सरसो, सेमरी, दारा, बाराही, सरदह और जंगलमहल जैसे बीहड़ों में भी सफलता प्राप्त की। पुलिस व प्रशासन की पूरी सहायता मिलती रही। जो-जो समस्या बताते हम लोग उसका प्लान बनता और काम शुरू होता गया तो लोगों में हमारे प्रति विश्वास बढता गया। दिव्यांशु ने बताया कि इन नक्सल प्रभावित गांवों की सबसे बड़ी हैवानियत जिसे हमने दूर किया वह थी, बेटियों को बचाना। बताया कि यहां की प्रथा थी कि जिस भी घर में बेटी जन्म लेती पुरुष लोग उसे मार डालते थे।
इसका पता भी एक दिन बात-बात में ही चला। ऐसे में हम लोगों ने उन्हीं महिलाओं की टीम की सहायता ली और पुरुषों को समझाने का प्रयास किया। अब तसल्ली यह है कि जिस भी घर में बेटी जन्म लेती है हम लोग अपने पास से चंदा इकट्ठा कर उनके घर पुष्टाहार के रूप में फल व अन्य सामग्री पहुंचाते हैं। गांव की महिलाएं ढोलक पर सोहर गाती हैं। यानी अब वहां बेटी अभिषाप नहीं रही, ऐसे मौके पर जश्न मनाया जाता है। दिव्यांशु ने बताया कि अब अधिकारी बदल गए हैं तो थोडी परेशानी आने लगी है। इन बीहड़ों में सड़क बनवाने का काम पूरा नही हो पा रहा है। आलम यह है कि बरसात के दिनों में ये गांव टापू बन जाते हैं। आसपास के इलाकों से इनका हर तरह का संपर्क टूट जाता है। फिर भी हम लोग जुटे हैं ताकि इन्हें सड़क भी मिल सके। उनका कहना है कि काम प्रशासन के सहयोग से ही किए गए, मगर उन पर दबाव बनाना, प्रोजेक्ट तैयार करना, गांवों में महिलाओं, बच्चों को शिक्षित करना, स्कूल चलाना, बनारस से मिर्जापुर के गांवों में जाना आदि इन सभी का खर्च हम लोग अपने पाकेट खर्च से निकालते हैं।